दुर्ग-राजनांदगाँव उच्च भूमि में अनुसूचित जनजाति कृषकों में कृषि निवेश-निर्गत एवं भूमि निर्वहन क्षमता
रामेश्वर प्रसाद ठाकुर1’ सरला शर्मा2
1सहायक प्राध्यापक, भूग¨ल, शासकीय महाविद्यालय, अतंागढ़, जिला काकेंर (छ.ग.)
2प्राध्यापक, भूग¨ल अध्यनशाला, पं.र. वि. वि., रायपुर (छ.ग.)
प्रस्तावना
किसी भी उत्पादित फसलों में निवेश का मूल्य एवं उत्पादित फसलों के मूल्य का अंतर ही कृषकों का लाभ होता है। लाभांश में वृद्धि, कृषि में निवेश के वृद्धि से धनात्मक संबंध होता है। निवेश में वृद्धि से उपज में वृद्धि होगा। क्षेत्र में मूल्य निवेश के अन्तर्गत मानव श्रम, पशु शक्ति, उर्वरक, खाद एवं बीज प्रमुख अवयव है। अध्ययन क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति कृषिकों के द्वारा कृषिकों परंपरागत कृषि में मानव श्रम एवं पशु शक्ति, उर्वरक तथा बीजों के लिए पूँजी नियोजन, कृषि व्यवस्था में प्रमुख अवयव होता है, इसके अलावा कृषि उपकरण एवं सिंचाई के साधनों का उपयोग, पूँजी एवं अन्य साधनों पर निर्भर करता है। कृषि भूमि की उर्वरता, वर्षा की नियमितता एवं निश्चितता, तापमान, भू-स्वामित्व, जोत का आकार, आदि भी कृषि निवेश-निर्गत को प्रभावित करता है।
अध्ययन क्षेत्र -
अध्ययन क्षेत्र, छत्तीसगढ़ राज्य के दुर्ग एवं राजनांदगाँव जिला के दक्षिणी उच्चभूमि में स्थिति, डौंडी एवं मानपुर अनुसूचित जनजाति बहुल विकासखण्ड है। क्षेत्र में दल्ली राजहरा (लौह अयस्क) खनिज नगर होने के बावजूद, क्षेत्र आर्थिक एवं सामाजिक विकास में पिछड़ा हुआ है। अध्ययन क्षेत्र में लाल-पीली एवं पहाड़ी मिट्टी की अधिकता है। वनोपज क्षेत्र में लकड़ी एवं तेन्दूपत्ता का संग्रहण मुख्य कार्य है। अध्ययन क्षेत्र में धान प्रमुख कृषि फसल है। क्षेत्र में वार्षिक औसत वर्षा 120 सेमी. होती है। दल्ली राजहरा-दुर्ग रेलमार्ग, क्षेत्र को देश के अन्य भाग से जोड़ती है।
शोध का मुख्य उद्देश्य, शोध परिकल्पना द्वारा क्षेत्र के अनुसूचित जनजातिय¨ के कृषि में श्रम का अधिक निवेश तथा कृषि उत्पादन लाभ नगण्य होने की धारणा को सत्यापित करना है।
शोध विधि -
प्रस्तुत अध्ययन मुख्यतः प्राथमिक आंकड़ों पर आधारित है। इसमें डौंडी एवं मानपुर विकासखण्ड से यादृच्छिक निदर्शन द्वारा छः-छः गाँव चयन कर वहाँ के शत्-प्रतिशत् अनुसूचित जनजातियों परिवारो से आंकड़ों के संग्रहण हेतु अनुसूची प्रयुक्त किया गया। डौंडी विकासखण्ड से 257 परिवार एवं मानपुर विकासखण्ड से 246 परिवार सर्वेक्षित किए गए। इस प्रकार कुल 503 अनुसूचित जनजाति परिवारों के कृषि में निवेश-निर्गत एवं भूमि की निर्वहन का अध्ययन किया गया है। प्रस्तुत अध्ययन, अनुसूचित जनजाति के कृषि एवं कृषि लाभ के पक्षों का सूक्ष्म एवं अभिनव प्रयास है, जो भविष्य में अनुसूचित जनजाति के कृषि संबंधित नीति निर्धारित करने में एवं उसके अनुरूप भूवैन्यासिक पुनर्गठन के लिए कार्यक्रम क्रियान्वित करने में उत्प्रेरक माध्यम होंगे। अनुसूचित जनजाति के कृषि संबंधित समस्याओं के निराकरण एवं कृषि लाभ में वृद्धि हेतु नीति निर्धारित करने एवं उनके चहुमुखी विकास का मार्ग प्रशस्त करना शोध की व्यावहारिक सार्थकता है।
कृषि निवेश -
भू-स्वामित्व
कृषि निवेश के अन्तर्गत भूमि स्वामित्व प्रणाली तथा जोत का आकार, किसी भी क्षेत्र विशेष की कृषि अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। वस्तुतः भूमि का स्वामित्व, कृषकों के स्वयं के होने से कृषक, कृषि विकास की दीर्घकालिक योजना निर्माण करने और उनके लाभों की अवधि निश्चित एवं लाभांश आकलन करने में सक्षम रहता है। इसके अतिरिक्त भूमि तथा अन्य गतिशील वस्तुओं के विकास में लगाई जाने वाली पूँजी की मात्रा, भू-स्वामित्व पर ही निर्भर करती है। स्वयं की भूमि में कृषक निर्णय लेने में जहाॅ पूर्णतः स्वतंत्र होता है, वहीं किराए की भूमि के स्वामित्व होने पर कृषि संबंधी निर्णय में पूर्णतया स्वतंत्र नहीं रह पाता।
क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति परिवार¨ में दो प्रकार की कृषि भू-स्वामित्व प्रणाली प्रचलित है। प्रथम पूर्णतः निजी (97.22 प्रतिशत परिवार) एवं द्वितीय वे भू-स्वामित्व जो अल्पावधि के लिए किराए पर जोत (2.78 अनुसूचित जनजाति परिवार) लेकर कृषि करते है, जिसे स्थानीय बोली में रेगहा एवं अधिया कहते है।
जोत का आकार -
साधारण अर्थों में जोत, भूमि के उस भाग को कहा जाता है, जिसके प्रयोग के लिए भू-स्वामी अधिकृत होता है तथा उसे कानूनी दृष्टि से भूमि का अधिकार प्राप्त होता है। अध्ययन क्षेत्र में निरंतर कृषि भूमि पर बढ़ती हुई जनसंख्या के दबाव तथा उत्तराधिकार के नियमों के फलस्वरूप जोत के औसत आकार में भी उत्तरोत्तर परिवर्तन हो रहा है, इसके परिणामस्वरूप जोत छोटे-छोटे भूखण्डो में बंटता जा रहा है, जिसने अनुसूचित जनजाति कृषकों की कृषि स्तर को प्रभावित किया है। अध्ययन क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति कृषकों में तकनीकी ज्ञान एवं उपयोग का स्तर निम्न है, क्योंकि कृषि तकनीकी के विस्तार एवं उपयोग के लिए जोतों के आकार का बहुत होना आवश्यक है। अनुसूचित जनजाति के कृषि जोतों का प्रमुख विशेषता छोटे आकार के साथ ही बिखरा होना है। क्षेत्र के सर्वेक्षित अनुसूचित जनजाति (503 परिवार) में जोत के आकार में पर्याप्त विषमताएँ है।
कुल अनुसूचित जनजाति परिवारों में से 28.42 प्रतिशत परिवार भूमिहीन एवं सीमांत कृषक परिवार है, जबकि 32.80 प्रतिशत परिवार लघु कृषक (1-2 हेक्टेयर), 21.87 प्रतिशत परिवार अर्द्धमध्यम (2-4 हेक्ट.) कृषक तथा 4.18 प्रतिशत परिवार वृहत जोत (10 हेक्टेयर से अधिक) कृषक श्रेणी में है। क्षेत्र में भूमिहीन एवं सीमांत तथा लघु जोत परिवार (61.22 प्रतिशत परिवार) कृषक श्रेणी में है। क्षेत्र में भूमिहीन एवं सीमांत तथा लघु जोत परिवार (61.22 प्रतिशत परिवार) की अधिकता कृषकों के निम्न स्तर का परिचायक है। क्षेत्र में मात्र 2.78 प्रतिशत भूमिहीन है, भूमिहीन परिवार की कम मात्रा शत् प्रतिशत अजजा परिवारों को
स्रोत: व्यक्तिगत सर्वेक्षण
शासकीय योजनाओं के तहत आबंटित कृषि भूमि है, तथापि सीमांत एवं लघु जोत परिवारों की अधिकता उनके भू-स्वामित्व होने के बावजूद उनकी आर्थिक स्थिति की विपन्नता को प्रकट करते हैं। इसी प्रकार क्षेत्र के अजजा परिवारों की निम्न आर्थिक स्तर उनके कृषि तकनीकी के परम्परागत स्तर को भी प्रदर्शित करते है, जो अजजा कृषक¨ के कृषि विकास में प्रमुख बाधक है (तालिका क्र 01)। सर्वेक्षित गाँव में भूमिहीन एवं सीमांत जोत वाले कृषक परिवार का सर्वाधिक प्रतिशत भीमाटोला गाँव (45.45 प्रतिशत) में है
जबकि हिल्चुर गाँव में (11.54 प्रतिशत) में भूमिहीन एवं सीमांत कृषक परिवार का प्रतिशत सबसे कम पाया गया। उल्लेखनीय है कि भीमाटोला में में प्रवासीय आदिवासी परिवारों एवं एकांकी परिवारों की संख्या अधिक है, जबकि हिल्चूर में संयुक्त परिवार अपेक्षाकृत अधिक है। क्षेत्र में जहाँ जोत के आकार बड़े है, वहाँ भी कृषि विकास की गति धीमी है क्योंकि संयुक्त परिवार में प्रति व्यक्ति भूमि के भार में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ।
अनुसूचित जनजाति परिवारों में भूमि उपयोग -
सर्वेक्षित गाँव के अजजा वनाच्छादित एवं दुर्गम भू-मार्गो में निवासरत हैं, जहाँ भूमि का कृषि एवं आवासीय के लिए अधिकतम प्रयोग एक कठिन कार्य होता है, क्योंकि इन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति कृषि तकनीक ज्ञान से वंचित होते हैं, परिणामतः अनुपजाऊ एवं असमतल भूमि में पराम्परागत विधि से कृषि कार्य करना अनुसूचित जनजाति परिवारों के लिए अत्यंत मुश्किल होता है। परिणामतः सर्वेक्षित गाँव में कुल भूमि का 47.26 प्रतिशत भाग शुद्ध बोया क्षेत्र के अन्तर्गत है। सर्वेक्षित परिवारों में कुल फसली भूमि (1322.77 हेक्टेयर) में कुल निरा फसली भूमि का क्षेत्र 95.04 प्रतिशत है, जबकि इस अवधि में 4.96 प्रतिशत भूमि चालू पड़ती के अन्तर्गत पाया गया।
उल्लेखनीय है कि अजजा कृषक परिवारो में पड़ती भूमि की मात्रा गैर अजजा कृषको से अधिक है, जो अजजा परिवारों में कृषि के प्रति कम जागरूकता को प्रदर्शित करती है। सर्वेक्षित हिल्चुर गांव (23.86 प्रतिशत) में पड़ती भूमि वाले परिवार सर्वाधिक है जबकि पदभर्री गाँव (0.19 प्रतिशत) में पडत्रती भूमि वाले परिवार सबसे कम प्राप्त हुए। उल्लेखनीय है कि हिल्चुर गाँव में यद्यपि वृहत जोत परिवार (11.54 प्रतिशत) अपेक्षाकृत अधिक है, किन्तु यह गाँव दल्ली-राजहरा खनिज खनन केन्द्र के सन्नितकट है, जिसमें अनुपजाऊ एवं असमतल भूमि की अधिकता है, जिसके कारण आदिवासी भूमि को पड़ती छोड़ देते हैं, जबकि पदभर्री गाँव निम्न एवं समतल मैदानी भाग में स्थित है, जहाँ संपूर्ण कृषि भूमि में फसल पैदा करना कृषकों के लिए अधिक लाभदायक होता है।
सिंचाई -
सिंचाई वह साधन है, जिसके द्वारा फसल को कृत्रिम पद्वति से जल पहुँचकर जल की कमी को पूरा की जा सकता है। क्षेत्र में वर्षा की अनिश्चितता एवं अनियमितता से रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, उन्नत किस्म के बीजों आदि का लाभकारी उपयोग नहीं हो पाता, क्योंकि सिंचाई के बिना इन तत्वों में निहित गुण पूर्णरूपेण नष्ट प्राय होते है, अतः क्षेत्र की कृषि उत्पादकता में वृद्धि के लिए सुनियोजित एवं वर्ष पर्यंत सिंचाई सुविधाओं का होना अनिवार्य ही नहीं, अपितु आवश्यक भी है क्योंकि क्षेत्र में सिंचाई केवल जलापूर्ति ही नहीं अपितु अन्य कृषि निवेशों को भी आकर्षिक एवं उत्प्रेरित करती है। सर्वेक्षित परिवारों में कुल निरा फसली क्षेत्र का 5.10 प्रतिशत भूमि ही सिंचित है। सर्वाधिक सिंचित भूमि बोरगांव (7.13 प्रतिशत) में है, जबकि सबसे कम सिंचित भूमि हिल्चुर गाँव (0.79 प्रतिशत) में है। बोरगांव में तांदुला नदी अपने प्रारंभिक चरणों में बहती है, जिससे क्षेत्र में सिंचित भूमि का प्रतिशत अधिक है, जबकि हिल्चुर गाँव उच्च भू-भाग है जहाँ सिंचाई की सुविधा नगण्य है।
गोबर खाद -
अजजा परिवारों को गोबर खाद की उपयोगिता का महत्व ज्ञात है, तथापित गोबर का एक तिहाई भाग ईंधन के लिए उपले बनाने में प्रयुक्त किया जाता है, क्योंकि वर्षा एवं शीतकाल में शीत होने के कारण जलाऊ लकड़ी में आग नहीं लगती है।
उल्लेखनीय है कि अजजा परिवार कृषि कार्य को केवल जीविकोपार्जन से ही संबद्ध करते है, इसलिए उनकी रूचि अतिरिक्त फसल उत्पादन में कम होती है। सर्वेक्षित कृषक परिवारों (490 कृषक परिवार) में गोबर खाद का उपयोग प्रति हेक्टेयर 44.14 क्विंटल है, वहीं भीमाटोला गाँव में गोबर खाद प्रति हेक्टेयर उपयोग सबसे अधिक (98.12 क्विंटल) है। कृषि क्षेत्रफल की दृष्टि से गोबर खाद का सर्वाधिक उपयोग बोरगाँव (67.52 हेक्टेयर) में तथा सबसे कम पदभर्री गाँव (17.77 हेक्टेयर) में किया गया। क्षेत्र में कुल निरा फस्ली क्षेत्र में 32.17 प्रतिशत क्षेत्र में गोबर खाद प्रयुक्त किया गया, जो प्रति हेक्टेयर 65.86 क्विंटल है। गोबर खाद के उपयोग में क्षेत्रीय एवं पारिवारिक विषमताओं का कारण, जोत का आकार एवं निम्न आर्थिक स्थिति है।
रासायनिक उर्वरक -
भूमि की विभिन्नता के अनुसार उसमें पोषक तत्वों की कमी होती है, जिसकी पूर्ति गोबर खाद अथवा रासायनिक उर्वरकों के माध्यम से की जाती है। आदिवासी कृषकों द्वारा अध्ययन वर्ष मंे कुल निरा फसली क्षेत्र में से 51.33 प्रतिशत क्षेत्र में रासायनिक खादों का उपयोग किया गया, जो प्रति हेक्टेयर 1.74 क्विंटल है। सर्वेक्षित गाँव में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग सबसे अधिक (प्रति हेक्टेयर 2.24 क्विंटल) बोरगाँव में किया गया, जबकि जक्के गाँव (1.16 क्विंटल/हेक्टेयर) में प्रति हेक्टेयर रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग सबसे कम रहा। वस्तुतः अनुसूचित जनजाति परिवारों में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग धान की कृषि में किया जाता है। सिंचाई की कमी और अज्ञानता के कारण अनुसूचित जनजाति परिवार रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के लिए शासन द्वारा उपलब्ध सुविधाओं का उपयोग कम करते हैं।
उन्नत बीज -
अनुसूचित जनजाति कृषक स्वयं उत्पादित बीजों का ही उपयोग करते है, जो प्रायः पुराने हो जाते है तथा पुनः अंकुरण के लायक नहीं होते। अतः क्षेत्र में वृहत स्तर पर उपचारित उन्नतशील बीजों के प्रय¨ग को बढावा के लिए प्रचार की आवश्यकता है। सर्वेक्षित अनुसूचित जनजाति कृषकों में उन्नत बीज का प्रयोग 1.30 क्विंटल हेक्टेयर है। उन्नत बीज का अधिक प्रयोग घोरदा गाँव (1.73 क्विं./हेक्टेयर) में तथा सबसे कम घोडागाँव (83 क्विंटल/हेक्टेयर) में किया गया। घोरदा गाँव मैदानी भाग में स्थित हैं, जहाँ अपेक्षाकृत शिक्षित कृषक अपेक्षाकृत अधिक हैं जो कृषि नवाचार के प्रचार-प्रसार से प्रभावित है, वहीं घोड़ागाँव वनाच्छादित एवं दुर्गम क्षेत्र है, जहाँ निरक्षरता अधिक (45.92 प्रतिशत) है, अतः यहाँ के अजजा कृषक, कृषि के नवाचार के उपयोग एवं उपयोगिता दोनों से वंचित है।
कृषि उपकरण -
क्षेत्र में परम्परागत कृषि उपकरण प्रचलित है, जो कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अजजा कृषकों में कृषि नवप्रवर्नन के अन्र्तगत नवीन उपकरणों का उपयोग नगण्य है, जिसमें कम समय में अधिक कार्यो को पूर्ण किया जा सकता है। अध्ययन क्षेत्र के अजजा कृषकों का प्रमुख कृषि उपकरण हल और बैलगाड़ी है। अजजा कृषकों की निर्धनता एवं अज्ञानता के कारण आधुनिक उपकरणों का अभाव है। अजजा कृषक लकड़ी से बने हल का प्रयोग करते है। कहीं-कहीं आर्थिक दृष्टि से अपेक्षाकृत सम्पन्न कृषकों द्वारा जुताई के लिए ट्रैक्टरों का प्रयोग किराए में लेकर किया जाता है। अजजा कृषक परिवारों (503) में 948 हल तथा 356 बैलगाड़ी था। इसके अतिरिक्त 73 उड़ावनी पंखा, 289 बेलन, 16 डीजल पंप, 07 ट्यूबवेल है। इस प्रकार अजजा कृषक प्रति परिवार में 1.88 हल है, जबकि बैलगाड़ी 0.71 प्रति परिवार है। कुल निरा बोया क्षेत्र में प्रति 100 हेक्टेयर फसली क्षेत्र में हल की संख्या 75.46 है जबकि बैलगाड़ी 28.34 है। अजजा कृषकों द्वारा प्रति 100 हेक्टेयर फसली क्षेत्र में 5.81 उड़ावनी पंखा तथा 21.41 बेलन का उपयोग किया गया। क्षेत्र में सिंचाई के साधनों के अभाव में सिंचाई उपकरणों के प्रयोग का भी अभाव पाया गया। प्रति हेक्टेयर 0.012 डीजल पंप तथा विद्युत पंप 0.005 का प्रयोग किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त कृषि कार्यो में छोटे औजार का उपयोग किया जाता है, जिसमें हसिया, फावड़ा, कुदाली आदि प्रमुख है।
पशु संपदा -
क्षेत्र में परंपरागत् कृषि प्रचलित होने के फलस्वरूप पशुओं का उपयोग कृषि कार्य में अधिक प्रयोग किया जाता है। चयनित अजजा परिवारों में कुल पशुओं की संख्या 5805 हैं, जिसमें 2514 गौवंशी, 136 भैसवंशी, 10 सुअर, 1980 मुर्गियां तथा 366 बकरा/बकरी है। सर्वाधिक गौवंशी बोरगाँव (467) में तथा सबसे कम हिल्चुर में (85) में है। पशु इकाई की दृष्टि सर्वेक्षित अजजा परिवारों में 223 गौवंशी पशु तथा 123 भैसवंशी पशु इकाई है।
कृषि में श्रम एवं पशु शक्ति निवेश
किसी भी वस्तु को संसाधन में परिवर्तित करने हेतु मानवीय श्रम की आवश्यकता होती है। क्षेत्र की परंपरागत कृषि, मानव एवं पशु श्रम आधारित है, जिसमें इन दोनों के सामंजस्य से फसल उत्पादन किया जाता है। क्षेत्र की मुख्य फसल धान है, जिसमें क्षेत्र में मानव एवं पशु शक्ति की आवश्यकता होती है। क्षेत्र में मानवीय श्रम पारिवारिक अथवा कृषि मजदूर अथवा अदला-बदला व्यक्ति के रूप में प्रचलित है। चिशोल्म (1966) ने स्पष्ट किया है कि श्रम शक्ति (श्रमिक) चार प्रकार की होती है-1. पूर्णकालिक, 2. अंशकालिक, 3. लघुकालिक व 4. आकस्मिक (अनियमित)। अजजा परिवारों द्वारा श्रम निवेश का अधिकांश भाग की पूर्ति पारिवारिक श्रम द्वारा कर ली जाती है। धान की निंदाई कटाई एवं मिंजाई काल में अपेक्षाकृत श्रम की अधिक आवश्यकता होती है। क्षेत्र में निम्न आर्थिक स्तर होने एवं एक फसली क्षेत्र होने के कारण कृषि कार्य में मजदूर के उपयोग के बजाय परिवारिक सदस्यों को अधिक प्राथमिकता देते हैं अथवा इस श्रमिक की कमी की पूर्ति अदला-बदली श्रमिक से पूर्व करते है। क्षेत्र में अजजा कृषक धान की कृषि को अधिक महत्व देते हैं तथा धान की कृषि में प्रति हेक्टेयर 425 घंटे मानव श्रम एवं 185 घंटे पशु श्रम का निवेश करते हैं। अस्तु अजजा कृषक धान की कृषि में पशुधन की तुलना में जहाँ मानव श्रम प्रधान होती है, वहीं कृषि में अजजा कृषकों की अधिक निर्भरता को भी प्रदर्शित करता है। प्रस्तुत अध्यन में धान में कृषि निवेश के अन्र्तगत खाद डालना, बुआई करना, समतल करना, बियासी एवं निंदाई का कार्य, उर्वरक डालने का कार्य, सिंचाई का कार्य, मिंजाई एवं उड़ाई के कार्य के अन्र्तगत होने वाले मानवश्रम एवं पशु श्रम की गणना की गई है। क्षेत्र में प्रति हेक्टेयर धान की कृषि में मानव श्रम की सर्वाधिक निवेश कोहका गाँव (437 घंटे मानव श्रम) में तथा न्यूनतम मात्रा गंगोलीडीह गाँव (412 घंटे मानव श्रम) मंे प्राप्त हुआ। कोहका गाँव में कृषि भूमि (315.17 हेक्टे.) तथा कृषि मजदूर (142)
स्रोत: व्यक्तिगत सर्वेक्षण
की उपलब्धता अधिक है, जिसके कारण यहाँ कृषि कार्य में मानव श्रम की अधिकता पाई गई सके विपरीत गंगोलीडीह गाँव अपेक्षाकृत समतल भू-भाग में स्थित है, जहाँ यद्यपि कृषि भूमि (51.80 हेक्टेयर) कम है, किन्तु कृषकों के द्वारा नवीन कृषि तकनीकों का उपयोग अधिक किया जाता है, परिणामतः मानव श्रम का उपयोग अपेक्षाकृत कम द्रष्टव्य हुआ। (सारणी क्र.2)।
क्षेत्र में धान के अलावा यद्यपि कोदो-कुटकी, मड़िया, तुअर आदि फसलो का भी उत्पादन किया जाता है, किन्तु अनुसूचित जनजाति कृषक इन फसलों के प्रति उदासीन रहते हैं। तथापि अनुसूचित जनजाति कृषक इन फसलों के उत्पादन में खेत तैयार करने में बुआई, कटाई एवं ढुलाई तथा मिंजाई कार्य में ही मानव श्रम एवं पशु श्रम का उपयोग करते है। अनुसूचित जनजाति कृषक प्रति हेक्टेयर कोदो में 221 घंटे मानव श्रम एवं 149 घंटे पशु श्रम का निवेश करते है, जबकि कुटकी में 254 घंटे एवं 90 घंटे पशु श्रम, मड़िया में 342 घंटे मानव श्रम तथा 98 घंटे पशु श्रम का निवेश करते हैं। (सारणी क्रं.-3) विश्लेषण से स्पष्ट है कि मड़िया फसल के उत्पादन में मानव श्रम एवं पशु श्रम का निवेश अनुपात 3.48:1 है, जो मानव श्रम का पशु श्रम के साथ कम योगदान को प्रदर्शित करता है, वहीं कोदो फसल के उत्पादन में यह अनुपात 1.48:1 है, जो मानव श्रम की तुलना में पशु श्रम के लगभग समान निवेश को प्रदर्शित करता है (सारणी क्रं.-3)
सर्वेक्षित अनुसूचित जनजाति परिवारों में कुल श्रम निवेश का 63.52 प्रतिात श्रम परिवारों द्वारा 27.87 प्रतिशत श्रम की पूर्ति कृषि मजदूर द्वारा तथा 9.63 प्रतिशत श्रम अदला-बदली द्वारा प्राप्त होता है। परिवारों द्वारा सबसे अधिक श्रम की पूर्ति भीमाटोला गाँव में (79 प्रतिशत) तथा सबसे कम कोहका गाँव (58.50 प्रतिशत) में है। कोहका गाँव में जहाँ कृषि मजदूर, कृषि भूमि की अपेक्षा कम है, वही भीमाटोला गाँव में कृषको की अधिकता है। इसके विपरीत मजदूरी से श्रम की सर्वाधिक पूर्ति बोरगाँव (34.18 प्रतिशत) में एवं सबसे कम हिल्चूर गाँव (18 प्रतिशत ) में है। हिल्चूर गाँव में जहाँ भूमिहीन सीमांत एवं निम्न आर्थिक स्तर के अजजा कृषक परिवार अधिक है, वहीं बोरगाँव में वृहत जोत वाले परिवार अधिक है, जिसका स्पष्ट प्रभाव मजदूरी द्वारा श्रमपूर्ति पर दिखाई देता है। इस प्रकार क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति कृषक केवल जीविकोपार्जन के लिए कृषि करते हैं जिसके कारण कृषि उपज से आर्थिक लाभ कम प्राप्त होता है, फलस्वरूप अनुसूचित जनजातिय¨ के कृषि निवेश की प्रमुख समस्या अनुकूल निवेश के अभाव में उत्पादन मूल्य एवं उत्पादन दर दोनो का कम होना है।
अनुसूचित जनजाति परिवार की कृषि मुख्यतः प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण पर आधारित है। प्रतिकूल भौगोलिक स्थिति तथा सभ्यता एवं संस्कृति के मौलिक स्वरूप में जकड़े होने के कारण अनुसूचित जनजाति कृषको को कृषि से संबंधित कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उच्च एवं वनाच्छादित भूमि, अनुपजाऊ भूमि, अनियमित एवं अनिश्चित वर्षा आदि जैसी प्राकृतिक समस्याएँ है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव अनुसूचित जनजाति कृषकों की कृषि पर दिखाई देता है। उच्च एवं वनाच्छादित भूमि अजजा कृषको की कृषि के पिछडे़पन का सर्वाधिक प्रभावशील कारक है, जिसके तहत असमतल एवं अनुपजाऊ भूमि कृषि के लिए सर्वथा अनुपयुक्त होता है। क्षेत्र में सिंचाई का अभाव एवं मानसूनी वर्षा की अनिश्चितता एवं अनियमितता प्रति हेक्टर कृषि उत्पादन को कम कर देती है।
कृषि प्रणाली में निवेश निर्गत संबंध -
उत्पादित फसलों में निवेश का मूल्य एवं उत्पादन के मूल्य से ही कृषकों को लाभ होता है। क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति परिवार की निर्धनता के कारण कृषि में नकद व्यय कम करते है, क्योंकि धान उनके आहार एवं आर्थिक लाभ का प्रमुख आधार हैं। धान की कृषि में अनुसूचित जनजाति कृषक, मजदूरी एवं रासायनिक उर्वरक हेतु अपेक्षाकृत अधिक व्यय करते हैं। निर्धनता के कारण अनुसूचित जनजाति कृषक ट्रैक्टरों एवं परिष्कृत उपकरणों का प्रयोग कम करते हैं इसलिए इसमें व्यय अपेक्षाकृत कम होता है। इसी प्रकार अनुसूचित जनजाति कृषकों द्वारा मोटे अनाज, दलहन एवं तिलहन की कृषि में नकद व्यय नगण्य होता है। सर्वेक्षित अनुसूचित जनजाति कृषक धान की फसल में जहाँ औसत 2036 रूपए प्रति हेक्टेयर का निवेश करते है वहीं उन्हें कृषि उपज का औसत मूल्य 3160 रूपए प्राप्त होता है जबकि तिवरा में अनुसूचित जनजाति कृषकों को प्रति हेक्टेयर उत्पादन का औसत 420 रूपये निवेश के बदले 462 रूपए उत्पदन मूल्य प्राप्त होता है। इसी प्रकार अजजा कृषकों को धान के फसल में जहाँ सर्वाधिक (1124 रूपए) लाभ प्राप्त होता है, वही कोदो-कुटकी में 410 रूपए, कुलथी में 105 रूपए का लाभ तथा मड़िया में निवेश की तुलना में 68 रूपए कम प्राप्त होता है। इन फसलों में उत्पादन मूल्य कम प्राप्त होने से अपेक्षाकृत लाभ नहीं होता है, यद्यपि इस हानि को आदिवासी कृषक प्रत्यक्षतः अनुभव नहीं करते हैं, क्योंकि वे कृषि जीवन निर्वाह के लिए करते हैं न कि आर्थिक लाभ के लिए। धान के उत्पादन से जहाँ कृषक को आर्थिक दृष्टि से अधिक लाभ (1124 रूपए) प्राप्त होता है, इसलिए आदिवासी कृषकों द्वारा धान की फसल सर्वाधिक क्षेत्र (71.78 प्रतिशत) में बोयी जाती है। दलहन फसल के रूप में चना में निवेश मूल्य और उत्पादन मूल्य में धनात्मक (2250 रूपए) अंतर है, जो लाभ को प्रदर्शित करता है, किन्तु इसका उत्पादन क्षेत्र (2.0 प्रतिशत) कम हैं क्यांेकि इसकी कृषि में उपयुक्त मिट्टी और सिंचाई की सुविधा का होना आवश्यक है, जिसका क्षेत्र में कमी हैं।
भूमि की निर्वहन क्षमता -
भारत में भूमि पर निरंतर जनसंख्या का दबाव बढ़ रहा है, स्पष्ट है कि खाद्यान्नों में आनुपातिक कमी हो रही है। क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति परिवार अनुपजाऊ भूमि एवं निर्धनता से ग्रसित है। इसके अतिरिक्त जनसंख्या की भूमि में दबाव उनके खाद्य उपलब्धता को प्रभावित कर रहा है। भूमि की निर्वहन क्षमता से तात्पर्य उस क्षेत्र में निवास करने वाली जनसंख्या के पोषण के लिए आवश्यक उत्पादित सामग्री (भोजन) से है, जो उसकी शारीरिक तथा मानसिक क्षमताओं को विकसित कर सके। भूमि की भार वहन क्षमता का विचार स्टैम्प (1956) द्वारा रियो डि जेनेरो में आयोजित अंतरराष्ट्रीय भौगोलिक संघ के अध्यक्षात्मक भाषण में प्रयुक्त किया गया था। अनुसूचित जनजाति परिवारों की भूमि की निर्वहन क्षमता एवं खाद्य पर्याप्तता ज्ञात किया गया है। वस्तुतः इस विधि से कृषि भूमि की प्रति इकाई (प्रति हेक्टेयर/प्रति वर्ग कि.मी.) में व्यक्तियों के भरण पोषण की क्षमता ज्ञात की जाती है। निर्वहन क्षमता ज्ञात करने के लिए पहले प्रत्येक खाद्य फसलों के उत्पादन को केलोरीज में बदला जाता है।स्टैम्प ने खाद्य फसलों के 1/8 भाग (16.6 प्रतिशत) को कुल उत्पादन से घटा कर शेष उत्पादन को कैलोरीज में बदला है। स्टैम्प ने माना कि 16.6 प्रतिशत फसल उत्पादन बीज एवं अन्य कारणों से उपभोग योग्य नहीं रहता, जबकि सर्वेक्षण द्वारा कृषकों ने स्वीकारा है कि लगभग 12.5 प्रतिशत भाग ही बीज एवं अन्य कारणों से ही उपभोग के लिए उपलब्ध नहीं होता है। अतः क्षेत्र में भूमि निर्वहन क्षमता ज्ञात करने के लिए खाद्य फसलों के 12.5 प्रतिशत उत्पादन को कुल उत्पादन से घटा दिया गया, प्राप्त प्रति हेक्टेयर कैलोरी प्रति वयस्क व्यक्ति प्रति वर्ष बांधित कैलोरी से भागित कर प्रति हेक्टेयर वयस्क इकाई के दबाव को ज्ञात किया गया है। प्ब्डत् हैदराबाद द्वारा प्रति वयस्क प्रतिदिन 2400 कैलोरी उपभोग अनुशंसित किया हैं, जिसे गणना में भी आधार बनाया गया है।
क्षेत्र में आदिवासी पारिवारों में प्रति हेक्टेयर 1.90 वयस्क व्यक्ति आश्रित है, जबकि वास्तविक दबाव 1.95 वयस्क व्यक्ति है। स्पष्ट है कि आदिवासी परिवार की कृषि भूमि में वास्तविक दबाव से कम लोगों का निर्वहन कर रहे है। आदिवासी परिवारों में आश्रित एवं वास्तविक दबाव में अन्तर कम है, जबकि वास्तविकता यह है कि आदिवासी परिवारों में प्रति हेक्टेयर ज्ञात मात्रा से अधिक जनसंख्या का दबाव है, क्योंकि आदिवासी अन्य खर्चों के लिए खाद्यान्न फस्लों का विक्रय कर देते हैं, परिणामतः आदिवासी अनुशंसित मात्रा से
भी कम भोजन एवं पोषक तत्वों का उपयोग करते हैं (सारणी क्र-6)
निष्कर्ष:-
नवीन कृषि यंत्रों एवं तकनीकों के उपयोग ने कृषि को नया स्वरूप प्रदान किया है, किन्तु अनुसूचित जाति बहुल क्षेत्रों में नवीन तकनीकों एवं कृषि यंत्रों की उपयोगिता नगण्य है।
इसके लिए अनुसूचित जनजातिय¨ का भौगोलिक परिवेश, निर्धनता एवं अज्ञानता प्रमुख उत्तरदायी कारक है। आदिवासी परिवारों में उत्तराधिकारी नियमों के कारण जोत का आकार कम होता जा रहा है। छोटे जोत के कारण अनुसूचित जनजाति कृषक उन्नत कृषि नवाचार का उपयोग करने में असमर्थ है। अध्ययन क्षेत्र में यातायात साधनों का विस्तार नहीं हो पाया है। यहाँ आज भी कच्ची सड़कों की प्रमुखता है, जिसके कारण शासकीय योजनाओं का सफल क्रियान्वयन तथा कृषि नवाचार के साधनों का प्रचार-प्रसार नहीं हो पाता है। वस्तुतः कृषि नवाचार के साधनों का पर्याप्त दोहन दुर्गम यातायात सेवाओं के कारण संभव नहीं हो पाया है साथ ही कृषि ऋण, रासायनिक उर्वरक एवं उन्नत बीज वितरण केन्द्रों तक आदिवासियों की सम्बद्धता आवागमन की कमी के विच्छेद कर रखा है। इसके अलावा अशिक्षा एवं अज्ञानता, शासकीय योजनाओं की असफलता, आदिवासियों की निर्धनता कृषि के विकास के लिए अवरोधक कारक है, उपरोक्त कारको के साथ ही सिंचाई समस्या का निदान से ही अनुसूचित जनजाति के कृषि निर्गत में वृद्धि किया जा कर खाद्य उपलब्धता में वृद्वि किया जा सकता है।
REFRENCES:
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Received on 09.05.2014 Modified on 12.06.2014
Accepted on 20.06.2014 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences 2(2): April-June, 2014; Page 114-121